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Samveda/1101

सोमाः पवन्त इन्दवोऽस्मभ्यं गातुवित्तमाः। मित्राः स्वाना अरेपसः स्वाध्यः स्वर्विदः॥११०१

Veda : Samveda | Mantra No : 1101

In Hindi:

ऋषि : मनुः सांवरणः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५४८ क्रमाङ्क पर परमानन्दरस के विषय में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ विद्वान् गुरुओं और राजपुरुषों का विषय कहते हैं।

पदपाठ : सोमाः ।पवन्ते ।इन्दवः ।अस्मभ्यम् ।गातुवित्तमाः ।गातु ।वित्तमाः। मित्राः ।मि ।त्राः ।स्वानाः ।अरेपसः ।अ ।रेपसः ।स्वाध्यः ।सु ।आध्यः ।स्वर्विदः ।स्वः ।विदः॥

पदार्थ : (इन्दवः) मधुर व्यवहार से वा ज्ञानरस से आर्द्र करनेवाले, (अस्मभ्यं गातुवित्तमाः) हमारे लिए अतिशय मार्ग दिखानेवाले, (मित्राः) मित्रभूत, (स्वानाः) सद्गुणों को उत्पन्न करनेवाले, (अरेपसः) निष्पाप, (स्वाध्यः) उत्तम ध्यानवाले, (स्वविर्दः) दिव्य प्रकाश वा आनन्द को प्राप्त करानेवाले (सोमाः) ज्ञानरस के भण्डार गुरुजन वा सत्कर्मों में प्रेरित करनेवाले राजपुरुष (पवन्ते) शिष्यों वा प्रजाजनों के जीवनों को पवित्र करते हैं ॥१॥

भावार्थ : गुरुजन और राजपुरुष यदि विद्वान्, मधुर, मार्गदर्शक, मित्र के समान व्यवहार करनेवाले, शिक्षा द्वारा सद्गुण उत्पन्न करनेवाले, निरपराध, निर्दोष,अपने कार्य में दत्तावधान और पवित्रकर्ता होते हैं, तभी वे शिष्यों और प्रजाओं की उन्नति करने में समर्थ हो पाते हैं ॥१॥