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Samveda/1104

अया पवा पवस्वैना वसूनि माश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व। ब्रघ्नश्चिद्यस्य वातो न जूतिं पुरुमेधाश्चित्तकवे नरं धात्॥११०४

Veda : Samveda | Mantra No : 1104

In Hindi:

ऋषि : कुत्स आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५४१ क्रमाङ्क पर परमात्मा के पक्ष में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ वही विषय प्रकारान्तर से वर्णित किया जा रहा है।

पदपाठ : अया। पवा ।पवस्व ।एना ।वसूनि ।मश्चत्वे ।इन्दो। सरसि। प्र। धन्व ।ब्रध्नः ।चित्। यस्य ।वातः ।न ।जूतिम ।पुरुमेधाः ।पुरु ।मेधाः ।चित् ।तकवे ।नरम् ।धात्॥

पदार्थ : हे (इन्दो) तेजस्वी, आनन्दरस से सराबोर करनेवाले परमात्मन्, आप (अया) इस (पवा) धारा के साथ (एना) इन (वसूनी) दिव्य और भौतिक धनों को (पवस्व) प्रवाहित करो, (मांश्चत्वे) अभिमानी काम-क्रोध आदि शत्रुओं को नष्ट करनेवाले (सरसि) गतिशील जीवात्मा में (प्र धन्व) पहुँचो, (पुरुमेधाः चित्) बहुत मेधावी मनुष्य भी (तकवे) प्रगति के लिए (यस्य) जिन आपके (नरम्) नेतृत्व के गुण को (धात्) धारण करता है, (ब्रध्नः चित्) महान् (वातः) वायु (न) जैसे (जूतिम्) वेग को (धात्) धारण करता है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : वायु आदि सभी प्राकृतिक पदार्थ और सभी मनुष्य परमात्मा के ही पास से अपनी-अपनी शक्ति पाते हैं, उसके सरंक्षण के बिना वे कुछ भी नहीं कर सकते ॥१॥