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Samveda/1140

मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आ जातमग्निम्। कवि सम्राजमतिथिं जनानामासन्नः पात्रं जनयन्त देवाः।।॥११४०

Veda : Samveda | Mantra No : 1140

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ६७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के साक्षात्कार के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ भी वही विषय है।

पदपाठ : मूर्धानम् ।दिवः ।अरतिम् ।पृथिव्याः ।वैश्वानरम् ।वैश्व ।नरम् ।ऋते ।आ ।जातम् ।अग्निम ।कविम् ।सम्राजम् ।सम् ।राजम् ।अतिथिम्। जनानाम् ।आसन ।नः ।पात्रम् ।जनयन्त ।देवाः॥

पदार्थ : (मूर्धानम्) मूर्धा के समान सर्वोपरि विराजमान (दिवः) सूर्य के और (पृथिव्याः) पृथिवी के (अरतिम्) स्वामी, (वैश्वानरम्) सबके नेता, (ऋते) यज्ञ में (आ जातम्) सर्वत्र प्रसिद्ध, (कविम्) वेदकाव्य के कवि, (सम्राजम्) ब्रह्माण्ड के राजराजेश्वर, (जनानाम्) मनुष्यों के (अतिथिम्)अतिथि के समान पूज्य, (नः) हमारे (पात्रम्) पालनकर्ता (अग्निम्) अग्रनायक परमेश्वर को (देवाः) विद्वान् उपासक जन (आसन्) मुख से प्रणव-जप आदि करके (जनयन्त) अन्तरात्मा में प्रकट करते हैं ॥१॥

भावार्थ : सबके वन्दनीय, सब शुभ गुण-कर्म-स्वभावों से युक्त, विश्व के सम्राट् परमात्मा को जानकर, उसकी स्तुति और उपासना करके मनुष्यों को अपनी और दूसरों की उन्नति सिद्ध करनी चाहिए ॥१॥