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Samveda/1166

आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्। अग्ने त्वां कामये गिरा॥११६६

Veda : Samveda | Mantra No : 1166

In Hindi:

ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ भी उसी विषय को दर्शाते हैं।

पदपाठ : आ ।ते ।वत्सः ।मनः ।यमत् ।परमात्। चित् ।सधस्धात् ।सध ।स्थात् ।अग्ने ।त्वाम् ।कामये ।गिरा॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनायक, सर्वज्ञ, तेजस्वी परमात्मन् ! मैं (गिरा) स्तुति-वाणी से (त्वाम् कामये) तुझे चाहता हूँ। (ते वत्सः) तेरा पुत्र तुझे पाने के लिए (परमात् चित्) सुदूर भी (सधस्थात्) लोक से (मनः) अपने मन को (आयमत्) लौटा लाया है ॥१॥

भावार्थ : समीप वा दूर जहाँ-कहीं भी मेरा मन चला गया है, वहाँ से उसे लौटाकर परमात्मा में ही केन्द्रित करता हूँ ॥१॥