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Samveda/1173

यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र द्युक्षं तदा भर। विद्याम तस्य ते वयमकूपारस्य दावनः॥११७३

Veda : Samveda | Mantra No : 1173

In Hindi:

ऋषि : अत्रिर्भौमः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में फिर परमेश्वर और आचार्य का विषय है।

पदपाठ : यत् ।मन्यसे ।वरेण्यम् ।इन्द्र ।द्युक्षम् ।द्यु ।क्षम् ।तत् ।आ ।भर ।विद्याम ।तस्य ।ते ।वयम् ।अकूपारस्य ।दावनः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा आचार्य ! (यत्) जिसे, आप (वरेण्यम्) ग्रहण करने योग्य (मन्यसे) मानते हो, (तत्) उस (द्युक्षम्) धर्म और विद्या के प्रकाश के निवासक अपने दान को (आ भर) हमें प्राप्त कराओ। (ते) आपके (अकूपारस्य) जिसका भरना या संग्रह करना बुरा नहीं है, ऐसे (तस्य) उस (दावनः) दान को (वयम्) हम (विद्याम) पा लेवें ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर और आचार्य का जो सद्गुण, विद्या, धर्म, सदाचार आदि का दान है, उसे पाकर हम अपने आपको उन्नत करें ॥२॥