Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1174

यत्ते दिक्षु प्रराध्यं मनो अस्ति श्रुतं बृहत्। तेन दृढा चिदद्रिव आ वाजं दर्षि सातये (पी)।।॥११७४

Veda : Samveda | Mantra No : 1174

In Hindi:

ऋषि : अत्रिर्भौमः | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।

पदपाठ : यत् ।ते ।दिक्षु ।प्रराध्यम् ।प्र ।राध्यम् ।मनः ।अस्ति ।श्रुतम् ।बृहत् ।तेन ।दृढा ।चित् ।अद्रिवः ।अ ।द्रिवः ।आ ।वाजम् ।दर्षि। सातये॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमात्मन् वा आचार्य ! (यत् ते) जोआपका (प्र राध्यम्) प्रसन्न करने योग्य (बृहत् मनः) विशाल शक्तिवाला मन (दिक्षु) दिशाओं में (श्रुतम्) प्रसिद्ध (अस्ति) है, (तेन) उस मन से, हे (अद्रिवः) अविनष्ट बलवाले ! आप (दृढा चित्) कठिन और दुष्प्राप्य भी (वाजम्) धर्म, विद्या आदि के धन को (सातये) हमें प्राप्त कराने के लिए (आदर्षि) लाओ ॥३॥

भावार्थ : परमेश्वर और आचार्य सत्पात्र जनों को धर्ममार्ग की सुशिक्षा देकर, विद्या आदि का दान करके, पुरुषार्थ की प्रेरणा कर परमैश्वर्यवान् बनाते हैं ॥३॥इस खण्ड में परमात्मा और आचार्य के गुण वर्णित होने से, उनका आह्वान होने से और उनसे प्रार्थना की जाने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥अष्टम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥अष्टम अध्याय समाप्त ॥चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध समाप्त ॥