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Samveda/1176

ऋषिमना य ऋषिकृत्स्वर्षाः सहस्रनीथः पदवीः कवीनाम्। तृतीयं धाम महिषः सिषासन्त्सोमो विराजमनु राजति ष्टुप्॥११७६

Veda : Samveda | Mantra No : 1176

In Hindi:

ऋषि : प्रतर्दनो दैवोदासिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा के गुण-कर्मों का वर्णन है।

पदपाठ : ऋषिमनाः ।ऋषि ।मनाः ।यः ।ऋषिकृत् ।ऋषि ।कृत् ।स्वर्षाः ।स्वः ।साः ।सहस्रनीथः। सहस्र ।नीथः। पदवीः ।पद। वीः ।कवीनाम् ।तृतीयम्। धाम ।महिषः ।सिषासन्। सोमः ।विराजम् ।वि ।राजम् ।अनु ।राजति। स्तुप्॥

पदार्थ : (यः) जो (ऋषिमनाः) ऋषि स्वभाववाला, (ऋषिकृत्) उपासकों को ऋषि बनानेवाला, (स्वर्षाः) आनन्दप्रदाता, (सहस्रनीथः) सहस्र नीतियोंवाला, (कवीनाम्) क्रान्तदर्शियों को (पदवीः) उच्च पद प्राप्त करानेवाला है, वह (महिषः) महान्, (स्तुप्) सबका आधारस्तम्भरूप (सोमः) जगदीश्वर (तृतीयं धाम) मुक्ति पद को (सिषासन्) देना चाहता हुआ (विराजम्) विशेष तेज से युक्त मनुष्य को (अनुराजति) अनुरञ्जित करता है ॥२॥यहाँ ऋषि की आवृत्ति में लाटानुप्रास तथा राज की आवृत्ति में यमक अलङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : जो परमेश्वर ऋषिपद प्राप्त कराकर मोक्ष देता है, उसकी उपासना करके सब सौभाग्यवान् होवें ॥२॥