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Samveda/1177

चमूषच्छ्येनः शकुनो विभृत्वा गोविन्दुर्द्रप्स आयुधानि बिभ्रत्। अपामूर्मि सचमानः समुद्रं तुरीयं धाम महिषो विवक्ति (लु)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥११७७

Veda : Samveda | Mantra No : 1177

In Hindi:

ऋषि : प्रतर्दनो दैवोदासिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा का वर्णन है।

पदपाठ : चमूषत् ।चमू ।सत् ।शयेनः ।शकुनः। विभृत्वा ।वि ।भृत्वा ।गोविन्दुः ।गो। विन्दुः ।द्रप्सः। आयुधानि ।विभ्रत् ।अपाम् ।ऊर्मिम् ।सचमानः। समुद्रम् ।सम् ।उद्रम्। तुरीयम्। धाम् ।महिषः। विवक्तिः॥

पदार्थ : (चमूषत्) द्यावापृथिवी में स्थित, (श्येनः) प्रशंसनीय कर्मोंवाला, (शकुनः) शक्तिशाली (विभृत्वा) विशेषरूप से भरण-पोषण करनेवाला, (गोविन्दुः) गायों और भूमियों को प्राप्त करानेवाला, (द्रप्सः) आनन्दरस से भरपूर, (आयुधानि बिभ्रत्) शस्त्रास्त्रों को धारण करनेवाले सेनापति के समान दण्ड देने की शक्ति से युक्त, (अपाम् ऊर्मिम्) जलों के धारणकर्ता (समुद्रम्) समुद्र वा अन्तरिक्ष को (सचमानः) आश्रयस्थान बनाता हुआ अर्थात् उनमें विद्यमान रहता हुआ, (महिषः) महान् वह सोम नामक जगत्पति परमेश्वर (तुरीयं धाम) पुरुषार्थचतुष्टय में चौथे मोक्ष का (विवक्ति) उपदेश करता है ॥यहाँ यह शङ्का होती है कि पूर्वमन्त्र में मोक्ष को तृतीय धाम कहा गया है और इस मन्त्र में चतुर्थ धाम, यह कैसे सङ्गत है? इसका उत्तर है कि ‘प्रकृतिलोक, जीवात्मलोक, मोक्षलोक’ इस वर्गीकरण के अनुसार मोक्ष तृतीय धाम है और ‘धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष’ इस वर्गीकरण में चतुर्थ धाम। अतः दोनों सङ्गत हैं ॥३॥

भावार्थ : सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान् सज्जनों की उन्नति करनेवाले, दुष्टों को दण्ड देनेवाले जगदीश्वर का अनुभव करके सब दुःखों से मुक्ति पानी चाहिए ॥३॥