Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1199

दिवो नाभा विचक्षणोऽव्या वारे महीयते। सोमो यः सुक्रतुः कविः॥११९९

Veda : Samveda | Mantra No : 1199

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमात्मा की महिमा का वर्णन है।

पदपाठ : दिवः ।नाभा ।विचक्षणः ।वि ।चक्षणः ।अव्याः ।वारे ।महीयते ।सोमः ।यः ।सुक्रतुः ।सु ।क्रतुः ।कविः॥

पदार्थ : (विचक्षणः) सर्वद्रष्टा (सोमः) परमेश्वर, (यः) जो (सुक्रतुः) शुभकर्म करनेवाला और (कविः) जगद्रूप दृश्य काव्य का तथा वेदरूप श्रव्य काव्य का कवि है, वह (दिवः) तेजस्वी जीवात्मा के (नाभा) केन्द्रभूत प्राण में और (अव्याः वारे) प्रकृति के बाल के समान विद्यमान अर्थात् प्रकृति से निकले हुए व्यक्त जगत् में (महीयते) महिमा प्राप्त करता है ॥अथर्व० १०।८।३१ में कहा गया है कि “अवि नाम की एक देवता है, जो ऋत से परिवृत है, उसी के रूप से ये वृक्ष हरे और हरित माला को धारण करनेवाले बने हुए हैं।” इस प्रमाण से अवि शब्द प्रकृतिवाचक होता है ॥४॥

भावार्थ : जड़-चेतनरूप सब जगत् में अन्तर्यामी रूप से विद्यमान, सर्वज्ञ सब कर्मों को करनेवाला जगदीश्वर सर्वत्र कीर्ति प्राप्त किये हुए है ॥४॥