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Samveda/1200

यः सोमः कलशेष्वा अन्तः पवित्र आहितः। तमिन्दुः परि षस्वजे॥१२००

Veda : Samveda | Mantra No : 1200

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा और जीवात्मा के मिलन का वर्णन है।

पदपाठ : यः ।सोमः ।कलशेषु ।आ। अन्तरिति ।पवित्रे। आहितः ।आ। हितः ।तम् ।इन्दुः। परि ।सस्वजे॥

पदार्थ : (यः सोमः) जो जगत् को रचनेवाला, सर्वान्तर्यामी, रस का भण्डार, परम आह्लादक परमेश्वर (कलशेषु) बहुत सी कलाओं से युक्त शरीरों में (आ) निहित है और (अन्तः पवित्रे) पवित्र हृदय के अन्दर भी (आहितः) विद्यमान है, (तम्) उस परमेश्वर को (इन्दुः) तेजस्वी जीवात्मा (परिषस्वजे) आलिङ्गन करता है ॥५॥

भावार्थ : परमात्मा की शरण का सहारा लेना जीवात्मा को परमानन्दायक होता है ॥५॥