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Samveda/1204

अभि प्रिया दिवः कविउविप्रः स धारया सुतः। सोमो हिन्वे परावति (भे)।।॥१२०४

Veda : Samveda | Mantra No : 1204

In Hindi:

ऋषि : असितः काश्यपो देवलो वा | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब परमात्मा से होनेवाली आनन्द-वर्षा का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : अभि ।प्रिया ।दिवः। कविः ।विप्रः ।वि ।प्रः ।सः। धारया ।सुतः ।सोमः ।हिन्वे ।परावति॥

पदार्थ : (दिवः) तेजस्वी जीवात्मा के (प्रिया) प्रिय धाम अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों को (अभि) अभिलक्षित करके (धारया) धारारूप से (सुतः) अभिषुत किया गया (कविः) क्रान्तद्रष्टा, (विप्रः) विशेषरूप से पूर्णता देनेवाला (स सोमः) वह रसागार परमेश्वर क्रमशः (परावति) सबसे परे स्थित आनन्दमयकोश में (हिन्वे) पहुँचता है ॥९॥

भावार्थ : रस के भण्डार परमेश्वर में से अभिषुत की गयी आनन्द-रस की धाराएँ जीवात्मा को पूर्णरूप से आप्लावित कर देती हैं ॥९॥इस खण्ड में परमात्मा की महिमा, परमात्मा और जीवात्मा के मिलन तथा ब्रह्मानन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥नवम अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥