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Samveda/1219

अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा यजिष्ठं दूतमध्वरे कृणुध्वम्। यो मर्त्येषु निध्रुविर्ऋतावा तपुर्मूर्धा घृतान्नः पावकः॥१२१९

Veda : Samveda | Mantra No : 1219

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रारम्भ में पुरोहित के गुणों का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : अग्निम् ।वः ।देवम् ।अग्निभिः ।सजोषाः ।स ।जोषाः ।यजिष्ठम् ।दूतम् ।अध्वरे ।कृणुध्वम्। यः ।मर्त्येषु। निध्रुविः। नि। ध्रुविः ।ऋतावा ।तपुर्मूरद्धा ।तपुः ।मूर्द्धा ।घृतान्नः ।घृत । अन्नः। पावकः॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अग्निभिः सजोषाः) गार्हपत्य, आहवनीय आदि अग्नियों से प्रीति रखनेवाला अर्थात् उनका ज्ञानी हो, उस (यजिष्ठम्) यज्ञ के अतिशय साधक, (अग्निम्) अग्रगण्य (देवम्) विद्वान् को (वः) तुम लोग (अध्वरे) यज्ञ में (दूतम्) दूत के समान माध्यम अर्थात् पुरोहित (कृणुध्वम्) बनाओ, (यः) जो विद्वान् (मर्त्येषु) मनुष्यों में (निध्रुविः) अत्यन्त स्थिर मतिवाला, (ऋतावा) सत्यनिष्ठ, (तपुर्मूर्धा) परिपक्व मस्तिष्कवाला (घृतान्नः) घी-दूध आदि सात्त्विक पौष्टिक पदार्थ खानेवाला और (पावकः) पवित्रकर्ता हो ॥१॥

भावार्थ : सुयोग्य ही किसी मनुष्य को अध्यात्म यज्ञ तथा बाह्य यज्ञ में पुरोहित रूप से वरना चाहिए ॥१॥