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Samveda/1220

प्रोथदश्वो न यवसेऽविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्। आदस्य वातो अनु वाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति॥१२२०

Veda : Samveda | Mantra No : 1220

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में विद्वान् का विषय है।

पदपाठ : प्रोथत् ।अश्वः। न। यवसे ।अविष्यन् ।यदा। महः ।संवरणात् ।सम् ।वरणात् ।व्यस्थात् ।वि ।अस्थात्। आत् ।अस्व ।वातः ।अनु ।वाति ।शोचिः ।अध ।स्म। ते। वज्रनम् ।कृष्णम् ।अस्ति॥

पदार्थ : (अश्वः न) घोड़ा जैसे (यदा) जब (महः संवरणात्) विशाल घुड़साल से (व्यस्थात्) छूटता है, तब (अविष्यन्) खाना चाहता हुआ (यवसे) घास पाने के हेतु (प्रोथत्) हिनहिनाता है, वैसे ही जो अग्नि अर्थात् विद्वान् स्नातक (यदा) जब (संवरणात्) गुरुकुल के नियन्त्रण से (व्यस्थात्) छूटता है, तब (यवसे) मानव-समाज में (प्रोथत्) पूर्णता लाता है। (आत्) उसके अनन्तर (वातः) समाज का वातावरण (अस्य) इस विद्वान् स्नातक की (शोचिः) दीप्ति के अर्थात् प्रभाव के (अनु वाति) पीछे-पीछे चलता है। आगे प्रत्यक्षरूप में कहते हैं—(अध) उसके बाद, हे विद्वान् स्नातक ! (ते) तेरा (व्रजनम्) चलना-फिरना आदि व्यापार (कृष्णम् अस्ति) आकर्षक हो जाता है ॥२॥यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : जिसका समावर्तन संस्कार हो चुका है, ऐसा विद्वान् स्नातक गुरुकुल से बाहर आकर समाज में विद्या और सच्चरित्र का प्रसार करे ॥२॥