Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1224

गिराउ वज्रो न सम्भृतः सबलो अनपच्युतः। ववक्ष उग्रो अस्तृतः (छे)।।॥१२२४

Veda : Samveda | Mantra No : 1224

In Hindi:

ऋषि : सुकक्ष आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में फिर उसी विषय में कहा गया है।

पदपाठ : गिरा । वज्रः। न ।सम्भृतः। सम्। भृतः। सबलः। स। बलः ।अनपच्युतः ।अन् ।अपच्युतः ।ववक्षे। उग्रः ।अस्तृतः ।अ। स्तृतः॥

पदार्थ : (गिरा) निर्घोष से (वज्रः न) जैसे विद्युद्वज्र संयुक्त होता है, वैसे ही (गिरा) वेदवाणी वा प्रभावशालिनी वाणी से (सम्भृतः) संयुक्त, (सबलः) बलवान् (अनपच्युतः) अविचलित, (उग्रः) प्रचण्ड, (अस्तृतः) अहिंसित इन्द्र अर्थात् परमेश्वर, जीवात्मा वा राजा (ववक्षे) जगत् के भार को, शरीर के भार को वा राष्ट्र के भार को वहन करता है ॥३॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : जिसकी वाणियों का प्रभाव वज्रनिर्घोष के समान होता है, वह बलियों में बली, दुष्टों के प्रति प्रचण्ड, किसी से जीता न जा सकनेवाला, शत्रुओं को जीतनेवाला जो परमेश्वर, जीवात्मा और राजा है, उसे सहायक पाकर सब लोग जीवन-सङ्ग्राम में विजयी होवें ॥३॥इस खण्ड में पुरोहित, विद्वान् स्नातक तथा परमात्मा, जीवात्मा और राजा का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥नवम अध्याय में षष्ठ खण्ड समाप्त ॥