Samveda/1225
अध्वर्यो अद्रिभिः सुत सोमं पवित्र आ नय। पुनाहीन्द्राय पातवे॥१२२५
Veda : Samveda | Mantra No : 1225
In English:
Seer : uchathyaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : adhvaryaa adribhiH suta.m soma.m pavitra aa naya . punaahiindraaya paatave.1225
Component Words : ayvaryo .adribhiH .a .dribhiH .sutam .somam. pavitre .aa .nava .punaahi .indraaya .paatave.
In Hindi:
ऋषि : उचथ्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४९९ क्रमाङ्क पर ज्ञान-यज्ञ के विषय में की गयी थी। यहाँ उपासना-यज्ञ का वर्णन करते हैं।
पदपाठ : अय्वर्यो ।अद्रिभिः ।अ ।द्रिभिः ।सुतम् ।सोमम्। पवित्रे ।आ ।नव ।पुनाहि ।इन्द्राय ।पातवे॥
पदार्थ : हे (अध्वर्यो) उपासना-यज्ञ के सञ्चालक उपासक ! तू (अद्रिभिः) ध्यानरूप सिल-बट्टों से (सुतम्) अभिषुत किये गये (सोमम्) भक्तिरस को (पवित्रे) पवित्र हृदय में (आनय) ला और (इन्द्राय पातवे) परमात्मा के पान के लिए उसे (पुनीहि) पवित्र कर ॥१॥
भावार्थ : छल, छिद्र, आडम्बर आदि से रहित पवित्र भक्तिरस से ही परमेश्वर तृप्त होता है ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : उचथ्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ४९९ क्रमाङ्के ज्ञानयज्ञविषये व्याख्याता। अत्रोपासनायज्ञविषयो वर्ण्यते।
पदपाठ : अय्वर्यो ।अद्रिभिः ।अ ।द्रिभिः ।सुतम् ।सोमम्। पवित्रे ।आ ।नव ।पुनाहि ।इन्द्राय ।पातवे॥
पदार्थ : हे (अध्वर्यो) उपासनायज्ञस्य सञ्चालक उपासक ! त्वम् (अद्रिभिः) ध्यानरूपैः पेषणपाषाणैः (सुतम्) अभिषुतम् (सोमम्) भक्तिरसम् (पवित्रे) परिपूते हृदये (आनय) आहर। किञ्च, (इन्द्राय पातवे) परमात्मनः पानाय तम् (पुनाहि) पुनीहि, पवित्रय ॥१॥२
भावार्थ : छलच्छिद्राडम्बरादिरहितेन पवित्रेणैव भक्तिरसेन परमेश्वरस्तृप्यति ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० ९।५१।१, ‘आ सृ॑ज। पुनी॒हीन्द्रा॑य॒’ इति पाठः। य० २०।३१ ‘आ न॑य। पु॒नी॒हीन्द्रा॑य’ इति पाठः। साम० ४९९।२. यजुर्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रमिमं सोमौषधिविषये व्याख्यातवान्।