Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1231

यदिन्द्र प्रागपागुदङ्न्यग्वा हूयसे नृभिः। सिमा पुरू नृषूतो अस्यानवेऽस्रिं प्रशर्ध तुर्वशे॥१२३१

Veda : Samveda | Mantra No : 1231

In Hindi:

ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : बार्हतः प्रगाथः (विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २७९ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा वा राजा दोनों का विषय कहा जा रहा है।

पदपाठ : यत् ।इन्द्र ।प्राक् ।अपाक् ।अप ।अक् ।उदक् ।उत् ।अक् ।म्यक् ।नि ।अक् ।वा ।हूयसे ।नृभिः ।सिम ।पुरु ।नृसूतः ।नृ ।सूतः। असि ।आनवे ।असि ।प्रशर्द्ध ।प्र ।शर्ध। तुर्वशे॥

पदार्थ : (यत्) क्योंकि, हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् शत्रुविदारक परमात्मन् वा राजन् ! आप (प्राक्) पूर्व दिशा में, (अपाक्) पश्चिम दिशा में, (उदक्) उत्तर दिशा में, (न्यक् वा) और दक्षिण दिशा में (नृभिः) पुरुषार्थी जनों से (हूयसे) भक्ति-प्रदान द्वारा वा करादि-प्रदान द्वारा सत्कार किये जाते हो, इसलिए (नृषूतः) उपासक जनों से वा प्रजाजनों से प्रेरित आप (सिमा) सर्वत्र (पुरु) बहुत अधिक (आनवे) मानव-समाज में (असि) उपकारक होते हो। हे (प्रशर्ध) प्रकृष्टरूप से शत्रुओं का धर्षण करनेवाले परमात्मन् वा राजन् ! आप (तुर्वशे) हिंसकों को वश में करनेवाले वीर मनुष्य के (असि) सहायक होते हो ॥१॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर सब धार्मिक जनों का सहायक और रक्षक होता है, वैसे ही राजा का यह कर्तव्य है कि वह सब राज्याधिकारियों का तथा प्रजाजनों का सहायक और रक्षक होवे ॥१॥सायणाचार्य ने इस मन्त्र की व्याख्या में लिखा है कि अनु नाम का एक राजा था, जिसका राजर्षि पुत्र आनव है और तुर्वश भी एक राजा का नाम है। यह उसकी व्याख्या काल्पनिक होने से तथा योगार्थशैली के विरुद्ध होने के कारण सङ्गत नहीं है ॥