Samveda/1254
मत्सि वायुमिष्टये राधसे नो मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः। मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम॥१२५४
Veda : Samveda | Mantra No : 1254
In English:
Seer : paraasharaH shaaktyaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : triShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : matsi vaayumiShTaye raadhase no matsi mitraavaruNaa puuyamaanaH . matsi shardhaa maaruta.m matsi devaanmatsi dyaavaapRRithivii deva soma.1254
Component Words : matsi .vaayum. iShTaye. raadhase .naH .matsi. mitraa. mi .traa .varuNaa .puuyamaanaH .matsi .sharddhaH .maarutam .matsi. .devaan .matsi .dyaavaa .pRRithivii .iti. deva .soma.
In Hindi:
ऋषि : पराशरः शाक्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा का कर्म वर्णित है।
पदपाठ : मत्सि ।वायुम्। इष्टये। राधसे ।नः ।मत्सि। मित्रा। मि ।त्रा ।वरुणा ।पूयमानः ।मत्सि ।शर्द्धः ।मारुतम् ।मत्सि। ।देवान् ।मत्सि ।द्यावा ।पृथिवी ।इति। देव ।सोम॥
पदार्थ : हे (देव) आनन्ददायक, (सोम) संसार के रचयिता परमात्मन् ! आप (नः) हमारी (इष्टये) अभीष्ट-सिद्धि के लिए और (राधसे) ऐश्वर्य के लिए (वायुम्) पवन को (मत्सि) हर्षित करते हो, (पूयमानः) प्राप्त किये जाते हुए आप (मित्रावरुणा) प्राण-अपान को (मत्सि) हर्षित करते हो, (मारुतं शर्धः) सैनिकों के बल को (मत्सि) हर्षित करते हो, (देवान्) विद्वान् जनों को (मत्सि) हर्षित करते हो, (द्यावापृथिवी) आकाश और भूमि को (मत्सि) हर्षित करते हो ॥२॥
भावार्थ : जो यह प्रकृति में सूर्य, चन्द्र, पवन, भूमि आदियों में, समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदियों में और शरीर में जीवात्मा, मन, बुद्धि, प्राण आदियों में हर्ष, स्फूर्ति और कर्मनिष्ठा दिखायी देती है, वह सब परमात्मा द्वारा ही की हुई है ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : पराशरः शाक्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : अथ परमात्मनः कर्म वर्णयति।
पदपाठ : मत्सि ।वायुम्। इष्टये। राधसे ।नः ।मत्सि। मित्रा। मि ।त्रा ।वरुणा ।पूयमानः ।मत्सि ।शर्द्धः ।मारुतम् ।मत्सि। ।देवान् ।मत्सि ।द्यावा ।पृथिवी ।इति। देव ।सोम॥
पदार्थ : हे (देव) मोदप्रद (सोम) जगत्स्रष्टः परमात्मन् ! त्वम् (नः) अस्माकम् (इष्टये) अभीष्टसिद्धये (राधसे) ऐश्वर्याय च (वायुम्) पवनम् (मत्सि) हर्षयसि, (पूयमानः) प्राप्यमाणः त्वम्। [पवते गतिकर्मा। निघं० २।१४।] (मित्रावरुणा) प्राणापानौ (मत्सि) हर्षयसि। (मारुतं शर्धः) सैनिकानां बलम्। [शर्ध इति बलनाम। निघं० २।९।] (मत्सि) हर्षयसि, (देवान्) विद्वज्जनान् (मत्सि) हर्षयसि, (द्यावापृथिवी) दिवं धरित्रीं च (मत्सि) हर्षयसि। [मदी हर्षग्लेपनयोः भ्वादिः। बहुलं छन्दसि। अ० २।४।७३ इति शपो लुक्] ॥२॥
भावार्थ : यदिदं प्रकृतौ सूर्यचन्द्रपवनभूम्यादिषु, समाजे ब्रह्मक्षत्रविडादिषु, देहे च जीवात्ममनोबुद्धिप्राणापानादिषु हर्षः स्फूर्तिः कर्मनिष्ठादि च दृश्यते तत्सर्वं परमात्मकृतमेव ॥२॥
टिप्पणी:१. ऋ० ९।९७।४२।