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Samveda/1253

अक्रान्त्समुद्रः प्रथमे विधर्मन् जनयन्प्रजा भुवनस्य गोपाः। वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः॥१२५३

Veda : Samveda | Mantra No : 1253

In Hindi:

ऋषि : पराशरः शाक्त्यः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५२९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और मेघ के विषय में की जा चुकी है। यहाँ फिर परमात्मा का ही विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : अक्रान् ।समुद्रः ।सम् ।उद्रः। प्रथमे ।विधर्मन्। वि ।धर्मम् ।जनयन् ।प्रजाः ।प्र ।जाः ।भुवनस्य ।गोपाः ।गो ।पाः ।वृषा ।पवित्रे ।अधि। सानौ ।अव्ये ।बृहत् ।सोमः ।वावृधे ।स्वानः ।अद्रिः। अ ।द्रिः॥

पदार्थ : इसी सोम परमात्मा के शासन में (समुद्रः) सूर्य (परमे) उच्च, (विधर्मणि) विशेष धारणकर्ता द्युलोक में (अक्रान्) अपनी धुरी पर घूमता है, जो सूर्य (प्रजाः जनयन्) प्रजाओं को उत्पन्न करता हुआ (भुवनस्य) सौरमण्डल का (गोपाः) रक्षक है। (पवित्रे) अन्तरिक्ष में और (अव्ये सानौ अधि) पृथिवी के उन्नत प्रदेश में (वृषा) वर्षा करनेवाला, (स्वानः) भूमि आदि लोकों को उनकी अपनी-अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर प्रेरित करता हुआ (अद्रिः) अविनश्वर (सोमः) जगत्स्रष्टा (बृहत्) बहुत अधिक (वावृधे) महिमा को प्राप्त हुआ है ॥१॥

भावार्थ : परमेश्वर ही अपनी महिमा से सूर्य को और उसके चारों ओर भूमि, चन्द्रमा आदि ग्रह-उपग्रहों को घुमा रहा है ॥१॥