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Samveda/1285

एष सूर्येण हासते सवसानो विवस्वता। पतिर्वाचो अदाभ्यः (के)।।॥१२८५

Veda : Samveda | Mantra No : 1285

In Hindi:

ऋषि : नृमेध आङ्गिरसः (प्रथम पादः) इध्मवाहो दार्ढच्युतः (शेषास्त्रयः पादाः) | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : एषः ।सूर्येम् ।हासते ।संवसानः ।सम्। वसान् ।विवस्वता ।वि। वस्वता ।पतिः। वाचः ।अदाभ्यः ।अ। दाभ्यः॥

पदार्थ : (संवसानः) सबको अपने तेज से आच्छादित करता हुआ (एषः) यह सोम परमेश्वर (विवस्वता) अन्धकार को दूर करनेवाले (सूर्येण) सूर्य के साथ (हासते) स्पर्धा करता है और (अदाभ्यः) जिसे दबाया या पराजित नहीं किया जा सकता, ऐसा यह (वाचः पतिः) वाणी का भी स्वामी है ॥६॥

भावार्थ : परमेश्वर सूर्य, बिजली आदि से भी अधिक तेजस्वी और वाचस्पतियों का भी मूर्धन्य है ॥६॥इस खण्ड में परमात्मा और जीवात्मा के विषयों का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥दशम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥