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Samveda/1286

एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते। पुनानो घ्नन्नप द्विषः॥१२८६

Veda : Samveda | Mantra No : 1286

In Hindi:

ऋषि : नृमेध आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में परमात्मा का विषय है।

पदपाठ : एषः । कविः । अभिष्टुतः । अभि । स्तुतः । पवित्रे । अधि । तोशते । पुनानः । घ्नन् । अप । द्विषः॥

पदार्थ : (अभिष्टुतः) स्तुति किया हुआ (कविः) मेधावी, क्रान्तद्रष्टा (एषः) यह सोम परमेश्वर (पुनानः) अन्तःकरण को पवित्र करता हुआ (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को (अपघ्नन्) मार भगाता हुआ (पवित्रे अधि) पवित्र अन्तरात्मा में (तोशते) प्रदीप्त होता है ॥१॥

भावार्थ : मलिन दर्पण में जैसे प्रतिबिम्ब भासित नहीं होता, वैसे ही मलिन अन्तरात्मा में परमेश्वर प्रकाशित नहीं होता ॥१॥