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Samveda/1300

पावमानीः स्वस्त्ययनीः सुदुघा हि घृतश्चुतः। ऋषिभिः सभृतो रसो ब्राह्मणेष्वमृत हितम्॥१३००

Veda : Samveda | Mantra No : 1300

In Hindi:

ऋषि : पवित्र आङ्गिरसः वा वसिष्ठो वा उभौ वा | देवता : पवमानाष्येता | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : आगे फिर वेद के अध्ययन का ही फल वर्णित है।

पदपाठ : पावमानीः । स्वस्त्ययनीः । स्वस्ति । अयनीः । सुदुघा । सु । दुघाः । हि । घृतश्चुतः । घृत । श्चुतः । ऋषिभिः । सम्भृतः । सम् । भृतः । रसः । ब्रह्मणेषु । अमृतम् । अ । मृतम् । हितम्॥

पदार्थ : (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (हि) निश्चय ही (स्वस्त्ययनीः) कल्याण प्राप्त करानेवाली, (सुदुघाः) मधुर दूध देनेवाली और (घृतश्चुतः) घी चुआनेवाली होती हैं। इनके अध्ययन से (ऋषिभिः) वेदरहस्यवेत्ता ऋषिजन (रसः) आनन्द-रस को (संभृतः) आस्वादन करते हैं और (ब्राह्मणेषु) वेदपाठी ब्राह्मणों को (अमृतम्) दुःखमोक्षरूप अमृतत्व (हितम्) प्राप्त होता है ॥३॥यहाँ ‘सुदुघाः’ और ‘घृतश्चुतः’ इन शब्दों के अर्थ से पावमानी ऋचाएँ दुधारू गायें हैं, यह व्यङ्ग्यार्थ निकलता है ॥३॥

भावार्थ : वेदों के अध्ययन से कर्मयोगी होकर लोग सब लौकिक और आध्यात्मिक सम्पदा प्राप्त कर लेते हैं ॥३॥