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Samveda/1301

पावमानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो अमुम्। कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः॥१३०१

Veda : Samveda | Mantra No : 1301

In Hindi:

ऋषि : पवित्र आङ्गिरसः वा वसिष्ठो वा उभौ वा | देवता : पवमानाष्येता | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में वेदाध्ययन से हमें क्या प्राप्त हो, यह आकाङ्क्षा व्यक्त की गयी है।

पदपाठ : पावमानीः । । दधन्तु । । नः । । इमम् । । लोकम् । । अथ । । उ । । अमुम् । । कामान् । । सम् । । अर्द्धयन्तु । । नः । । देवीः । । देवैः । । समाहृताः । । सम् । । आहृताः॥

पदार्थ : (पावमानीः) पवमान देवतावाली ऋचाएँ (नः) हमारे (इमं लोकम्) इहलोक को (अथ उ) और (अमुम्) परलोक को (दधन्तु) सहारा लगाएँ। (देवैः) वेदवेत्ता विद्वानों द्वारा (समाहृताः) पढ़ायी गयी वे (देवीः) अर्थप्रकाशक ऋचाएँ (नः) हमारे (कामान्) मनोरथों को (समर्द्धयन्तु) पूर्ण करें ॥४॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिए कि वे वेदों के अध्ययन से स्फूर्ति और सत्प्रेरणा प्राप्त कर इस लोक को, परलोक को और सब मनोरथों को समृद्ध करें ॥४॥