Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1306

त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः। त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः (ही)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१३०६

Veda : Samveda | Mantra No : 1306

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा की स्तुति करते हुए उससे प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : त्वम् । वरुणः । उत । मित्रः । मि । त्रः । अग्ने । त्वाम् । वर्द्धन्ति । मतिभिः । वसिष्ठाः । त्वे । इति । वसु । सुषणनानि । सु । मननानि । सन्तु । यूवम् । पात । स्वस्तिभिः । सु । अस्तिभिः । सदा । नः॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्रनायक परमात्मन् ! (त्वम्) आप (वरुणः) पापों के निवारक (उत) और (मित्रः) विपत्ति से बचानेवाले मित्र हो। (वसिष्ठाः) अतिशय विद्या के ऐश्वर्य से युक्त विद्वान् उपासक लोग (मतिभिः) स्तुतियों से (त्वाम्) आपको (वर्धन्ति) बढ़ाते हैं, अर्थात् जन-जन में प्रसारित करते हैं। (त्वे) आपमें विद्यमान (वसु) ऐश्वर्य (सुषणनानि) सुप्राप्य (सन्तु) होवें। (यूयम्) आप (स्वस्तिभिः) योग-क्षेमों द्वारा (सदा) हमेशा (नः) हमारी (पात) रक्षा करते रहो ॥३॥

भावार्थ : जो कुछ भी ऐश्वर्य हमारे हाथ में है, वह सब परमात्मा द्वारा प्रदत्त ही है ॥३॥