Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1320

अलर्षिरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः। यो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन् (लू)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१३२०

Veda : Samveda | Mantra No : 1320

In Hindi:

ऋषि : नृमेध आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में मनुष्य को परमात्मोपासना की प्रेरणा दी गयी है।

पदपाठ : अलर्षि । रातिम् । वसुदाम् । वसु । दाम् । उप । स्तुहि । भद्राः । इन्द्रस्य । रातयः । यः । अस्य । कामम् । विधतः । न । रोषति । मनः । दानाय । चोदयन्॥

पदार्थ : हे मानव ! तू (अलर्षिरातिम्) शोभास्पद दानवाले, (वसुदाम्) धन के दाता इन्द्रनामक परमैश्वर्यवान् परमात्मा की (उप स्तुहि) समीपता से स्तुति कर। (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यशाली परमात्मा की (रातयः) दान-परम्पराएँ (भद्राः) कल्याण करनेवाली होती हैं। (मनः) अपने मन को (दानाय) देने के लिए (चोदयन्) प्रेरित करता हुआ (सः) वह इन्द्र परमात्मा (विधतः) पूजा करनेवाले (अस्य) इस उपासक के (कामम्) मनोरथ को (न रोषति) असफल नहीं करता अर्थात् उसका अभीष्ट उसे देता ही है ॥२॥

भावार्थ : जो जिसके हित के लिए होता है, वह उसे जगदीश्वर देता है ॥२॥