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Samveda/1321

यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि। मघवन् छग्धि तव तन्न ऊतये वि द्विषो वि मृधो जहि॥१३२१

Veda : Samveda | Mantra No : 1321

In Hindi:

ऋषि : भर्गः प्रागाथः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक २७४ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ जगदीश्वर और आचार्य से प्रार्थना है।

पदपाठ : यतः । इन्द्र । भयामहे । ततः । नः । अभयम् । अ । भयम् । कृधि । मघवन् । शग्धि । तव । तत् । नः । ऊतवे । वि । द्विषः । वि । मृधः । जहि॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वर वा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्यवर ! हम (यतः) जिस अज्ञान, पाप, दुर्व्यसन, चोर, बाघ आदि से (भयामहे) डरते हैं, (ततः) उससे (नः) हमें (अभयम्) निर्भयता (कृधि) प्रदान करो। हे (मघवन्) निर्भयतारूप धन के धनी ! (शग्धि) हमें शक्ति दो। (तव) आपका (तत्) वह अभयदान (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिए होवे। आप (द्विषः) द्वेषवृत्तियों को (वि) विनष्ट कर दो, (मृधः) हिंसावृत्तियों को वा काम, क्रोध आदियों को (वि जहि) विनष्ट कर दो ॥१॥

भावार्थ : जैसे जगदीश्वर अपने उपासकों को निर्भय करता है, वैसे ही आचार्य को भी चाहिए कि वह विद्या पढ़ाने के साथ-साथ निर्भयता आदि गुण भी विद्यार्थियों के अन्दर उत्पन्न करे ॥१॥