Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1331

इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे। नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे (जी)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१३३१

Veda : Samveda | Mantra No : 1331

In Hindi:

ऋषि : अम्बरीषो वार्षागिरः ऋजिश्वा भारद्वाजश्च | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में गुरुजन कह रहे हैं।

पदपाठ : इन्द्राय । सोम । पातवे । वृत्रघ्ने । वृत्र । घ्ने । परि । सिच्यसे । नरे । च । दक्षिणावते । वीराय । सदनासदे । सदन । सदे॥

पदार्थ : हे (सोम) ज्ञानरस ! तू (वृत्रघ्ने) व्रतपालन द्वारा दोषों को विनष्ट करनेवाले, (नरे) पुरुषार्थी, (दक्षिणावते) गुरुदक्षिणा देनेवाले, (वीराय) शूरवीर, (सदनासदे) गुरुकुलरूप सदन में निवास करनेवाले (इन्द्राय) बिजली के समान तीव्र बुद्धिवाले विद्यार्थी के (पातवे) पान के लिए (परिषिच्यसे) प्रवाहित किया जा रहा है ॥३॥

भावार्थ : विद्यार्थियों को चाहिए कि वे स्वेच्छा से व्रतपालक, तपस्वी, शूर, आश्रम-पद्धति से गुरुकुल में ही निवास करनेवाले और समावर्तन के समय गुरुदक्षिणा देनेवाले हों ॥३॥