Samveda/1332
पवस्व सोम महे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय॥१३३२
Veda : Samveda | Mantra No : 1332
In English:
Seer : agnaye dhiShNyo aishvaraaH | Devta : pavamaanaH somaH | Metre : dvipadaa viraaT | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : pavasva soma mahe dakShaayaashvo na nikto vaajii dhanaaya.1332
Component Words : pavasva . soma . mahe . dakShaaya . ashvaH . na . niktaH . vaajii . dhanaaya.
In Hindi:
ऋषि : अग्नये धिष्ण्यो ऐश्वराः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : द्विपदा विराट् | स्वर : पञ्चमः
विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४३० क्रमाङ्क पर परमेश्वर और राजा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ गुरु-शिष्य का विषय वर्णित है।
पदपाठ : पवस्व । सोम । महे । दक्षाय । अश्वः । न । निक्तः । वाजी । धनाय॥
पदार्थ : हे (सोम) विद्यारस के भण्डार आचार्य ! आप शिष्य के (महे दक्षाय) महान् उत्साह के लिए (पवस्व) ज्ञानधारा को प्रवाहित करो, जिससे वह आपका शिष्य (अश्वः न) सूर्य के समान (निक्तः) शुद्ध और (वाजी) विद्यावान्, वेगवान् तथा कर्मनिष्ठ होकर (धनाय) धन उपार्जन करने के योग्य हो सके ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥
भावार्थ : शिक्षा का एक यह भी प्रयोजन है कि शिष्य विद्वान्, बलवान् वर्चस्वी और शुद्ध हृदयवाला होकर धन कमाने में समर्थ हो सके ॥१॥
In Sanskrit:
ऋषि : अग्नये धिष्ण्यो ऐश्वराः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : द्विपदा विराट् | स्वर : पञ्चमः
विषय : तत्र प्रथमा ऋक् पूर्वार्चिके ४३० क्रमाङ्के परमेश्वरनृपत्योर्विषये व्याख्याता। अत्र गुरुशिष्यविषयो वर्ण्यते।
पदपाठ : पवस्व । सोम । महे । दक्षाय । अश्वः । न । निक्तः । वाजी । धनाय॥
पदार्थ : हे (सोम) विद्यारसागार आचार्य ! त्वम्, शिष्यस्य (महे दक्षाय) महते उत्साहाय। [दक्षतिः उत्साहकर्मा। निरु० १।६।] (पवस्व) ज्ञानधारां प्रवाहय, येन स तव शिष्यः (अश्वः न) सूर्यः इव [असौ वा आदित्य एषो अश्वः। श० ७।३।२।१०] (निक्तः) शुद्धः, (वाजी), विद्यावान् वेगवान् कर्मनिष्ठो भूत्वा (धनाय) धनोपार्जनाय योग्यो भवेत् ॥१॥अत्रोपमालङ्कारः ॥१॥
भावार्थ : इदमपि शिक्षाया एकं प्रयोजनं यच्छिष्यो विद्वान् बलवान् वर्चस्वी शुद्धहृदयश्च भूत्वा धनार्जनक्षमो भवेत् ॥१॥
टिप्पणी:१. ऋ० ९।१०९।१०, ‘महे’ इत्यत्र ‘क्रत्वे॒’। साम० ४३०।