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Samveda/1365

अजीजनो हि पवमान सूर्यं विधारे शक्मना पयः। गोजीरया रहमाणः पुरन्ध्या॥१३६५

Veda : Samveda | Mantra No : 1365

In Hindi:

ऋषि : यरुणस्त्रैवृष्णः त्रसदस्युः पौरुकुत्स्य | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पिपीलिका मध्या अनुष्टुप | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर की स्तुति की गयी है।

पदपाठ : अजीजनः । हि । पवमान । सूर्यम् । विधारे । वि । धारे । शक्मना । पयः । गोजीरया । गो । जीरया । रहमाणः । पुरध्न्या । पुरम् । ध्या॥

पदार्थ : हे (पवमान) पवित्रकर्ता, सर्वान्तर्यामी परमेश्वर ! आपने (सूर्यम्) सूर्य को (अजीजनः हि) उत्पन्न किया है और (शक्मना) अपनी शक्ति से (विधारे) विधारक अन्तरिक्ष में (पयः) मेघ-जल को (अजीजनः) उत्पन्न किया है। आप (गोजीरया) भूमण्डल के जीवन की इच्छा से (पुरन्ध्या) बहुत अधिक प्रज्ञा तथा क्रिया द्वारा (रंहमाणः) शीघ्रकारी होते हो ॥२॥

भावार्थ : ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, विद्युत्, नक्षत्र, बादल आदि सब विलक्षण वस्तुएँ परमात्मा ने ही रची हैं, इनके निर्माण में किसी मनुष्य का सामर्थ्य नहीं है। वह सबकी हितकामना से बुद्धिपूर्वक चेष्टा करता है ॥२॥