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Samveda/1366

अनु हि त्वा सुत सोम मदामसि (महे समर्यराज्ये)* (ल)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१३६६

Veda : Samveda | Mantra No : 1366

In Hindi:

ऋषि : यरुणस्त्रैवृष्णः त्रसदस्युः पौरुकुत्स्य | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : पिपीलिका मध्या अनुष्टुप | स्वर : गान्धारः

विषय : तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ४३२ क्रमाङ्क पर परमात्मा, जीवात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा के विषय में व्याख्या की जा रही है।

पदपाठ : अनु । हि । त्वा । सुतम् । सोम । मदामसि । महे । समर्यराज्ये । समर्य । राज्ये । वाजान् । अभि । पवमान । प । गाहसे॥

पदार्थ : हे (सोम) ब्रह्माण्ड के सम्राट् जगदीश्वर ! (महे) महान् (समर्यराज्ये) देवासुरसङ्ग्राम से प्राप्त आन्तरिक साम्राज्य में, हम (सुतं त्वा) हृदय में प्रकट हुए आपको (अनु) लक्ष्य करके (मदामसि हि) मुदित होते हैं। हे (पवमान) पवित्र करनेवाले परमात्मन् ! आप (वाजान्) बलों में (अभि प्र गाहसे) अवगाहन करते हो, अतः हमें बल दो, यह भाव है ॥३॥

भावार्थ : अपने अन्तरात्मा में छिपे हुए परमात्मा को प्रकट करके आत्मबल और परम आनन्द प्राप्त किया जा सकता है ॥३॥