Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1371

उपो मतिः पृच्यते सिच्यते मधु मन्द्राजनी चोदते अन्तरासनि। पवमानः सन्तनिः सुन्वतामिव मधुमान् द्रप्सः परि वारमर्षति॥१३७१

Veda : Samveda | Mantra No : 1371

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा की उपासना का फल वर्णित है।

पदपाठ : अप । उप । मतिः । पृच्यते । सिच्यते । मधु । मन्द्राजनी । मन्द्र । अजनी । चोदते । अन्तः । आसनि । पवमानः । सन्तनिः । सम् । तनिः । सुन्वताम् । इव । मधुमान । द्रप्सः । परि । वारम् । अर्षति॥

पदार्थ : (मतिः) बुद्धि (उपपृच्यते उ) प्राप्त हो रही है, (मधु) माधुर्य (सिच्यते) सींचा जा रहा है, (आसनि अन्तः) मुख के अन्दर (मन्द्राजनी) आनन्दजनक शब्दों ओंकार, व्याहृति, गायत्री आदि को प्रेरित करनेवाली जिह्वा (चोदते) स्तुति-मन्त्रों को प्रेरित कर रही है। (पवमानः) बहता हुआ अथवा अन्तःकरण को पवित्र करता हुआ (सन्तनिः) भली-भाँति फैलनेवाला, (मधुमान्) मधुर (द्रप्सः) ब्रह्मानन्द-रस (वारम्) दोष-निवारक अन्तरात्मा को (परि अर्षति) प्राप्त हो रहा है, (सुन्वताम् इव) जैसे यजमानों की (पवमानः) गुरुकुल-निवास से स्वयं को पवित्र करती हुई, (मधुमान्) मधुर ज्ञान से वा मधुर व्यवहार से युक्त (सन्तनिः) सन्तान स्नातक होकर (वारम्) जन-समाज को (परि अर्षति) प्राप्त करती है ॥२॥यहाँ श्लिष्टोपमालङ्कार है। उत्तरार्धगत कारण से पूर्वार्धगत कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास है। प्, म्, न्, त्, स् की अलग-अलग आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है। ‘च्यते’ की आवृत्ति में यमक है। शान्त-रस है ॥२॥

भावार्थ : उपासक के अन्तरात्मा में ब्रह्मानन्द-रस का धाराप्रवाह होने पर विलक्षण मति और विलक्षण माधुर्य अनुभूत होता है ॥२॥