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Samveda/1372

उक्षा मिमेति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुप यन्ति निष्कृतम्। अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमत्कं न निक्तं परि सोमो अव्यत (ग)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१३७२

Veda : Samveda | Mantra No : 1372

In Hindi:

ऋषि : हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : आगे फिर वही विषय है।

पदपाठ : उक्षा । मिमेति । प्रति । यन्ति । धेनवः । देवस्य । देवीः । उप । यन्ति । निष्कृतम् । निः । कृतम् । अति । अक्रमीत् । अर्जुनम् । वारम् । अव्ययम् । अत्कम् । न । निक्तम् । परि । सोमः । अव्यतः॥

पदार्थ : (उक्षा) प्राणरूप बैल (मिमेति) डकरा रहा है, (धेनवः) इन्द्रियरूप गाएँ (प्रति यन्ति) बाह्य विषयों से लौट रही हैं। (देवीः) दिव्यगुणोंवाली मनोवृत्तियाँ (देवस्य) प्रकाशक जीवात्मा के (निष्कृतम्) आश्रय को (उप यन्ति) प्राप्त कर रही हैं। यह सब क्यों हो रहा है? क्योंकि (सोमः) जीवात्मा ने (अति) विघ्नों का अतिक्रमण करके (अर्जुनम्) श्वेत, निर्मल, (अव्ययम्) अविनश्वर (वारम्) वरणीय परमात्मा की ओर (अक्रमीत्) पग बढ़ाये हैं और (निक्तम्) शुद्ध (अत्कं न) कवच के समान, उसे (परि अव्यत) चारों और धारण कर लिया है ॥३॥चतुर्थ चरण में उपमालङ्कार है, उत्तरार्धगत कारण से पूर्वार्धगत कार्य का समर्थन होने से अर्थान्तरन्यास भी है ॥३॥

भावार्थ : परमात्मा के प्राप्त हो जाने पर जीव कवचधारी के समान रक्षित हो जाता है ॥३॥