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Samveda/1375

प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूकम्या यविष्ठ। त्वा शश्वन्त उप यन्ति वाजाः (डी)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१३७५

Veda : Samveda | Mantra No : 1375

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : अग्निः | छन्द : विराट् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।

पदपाठ : प्रेद्धः । प्र । इद्धः । अग्ने । दीदिहि । पुरः । नः । अजस्रया । अ । जस्रया । सूर्म्या । यविष्ठ । त्वाम् । शश्वन्तः । उप । यन्ति । वाजाः॥

पदार्थ : हे (यविष्ठ) अतिशय यौवनयुक्त (अग्ने) जीवात्मन् वा विद्युत् ! (प्रेद्धः) प्रदीप्त किया गया तू (अजस्रया) अक्षीण (सूर्म्या) तेजस्विता के साथ (नः पुरः) हमारे आगे (दीदिहि) चमक, (त्वाम्) तुझे (शश्वन्तः) बहुत से (वाजाः) बल (उप यन्ति) प्राप्त हैं ॥३॥

भावार्थ : जीवात्मा में बिजली के समान बड़ी भारी शक्ति निहित है। उसका उपयोग करके मनुष्य को तेजस्वी, प्रतापी, अग्रगन्ता और महान् होना उचित है ॥३॥