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Samveda/1376

आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः॥१३७६

Veda : Samveda | Mantra No : 1376

In Hindi:

ऋषि : सार्पराज्ञी | देवता : आत्मा सूर्यो वा | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ६३० क्रमाङ्क पर सूर्य, भूगोल, परमात्मा, जीवात्मा तथा स्तोता इन पाँचों पक्षों में की जा चुकी है। यहाँ चन्द्रमा और सूर्य का सम्बन्ध वर्णन करते हैं।

पदपाठ : आ । अयम् । गौः । पृश्निः । अकमीत् । असदत् । मातरम् । पुरः । पितरम् । च । प्रयन् । प्र । यन् । स्वऽ३रिति॥

पदार्थ : (अयम्) यह (पृश्निः) रंगीला (गौः) गतिमय चन्द्रलोक (आ अक्रमीत्) उदित हुआ है, जो (पुरः) पश्चिम से पूर्व की ओर (मातरम्) माता पृथिवी के चारों ओर (असदत्) गति करता है और (पितरम्) पितृस्थानीय (स्वः च) सूर्य की भी (प्रयन्) परिक्रमा करता है ॥१॥

भावार्थ : चन्द्रमा पृथिवी से अलग हुआ पिण्ड है, ऐसा वैज्ञानिक लोग मानते हैं। इसलिए पृथिवी चन्द्रमा की माता है। सूर्य के प्रभाव से ही वह पिण्ड पृथिवी से अलग हुआ, इस दृष्टि से सूर्य चन्द्रमा का पिता है। चन्द्रमा पृथिवी की परिक्रमा करता-करता पृथिवी के साथ-साथ सूर्य की भी परिक्रमा करता है, ऐसा खगोल शास्त्रवेत्ताओं का निरीक्षण है ॥१॥