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Samveda/1400

भद्रा वस्त्रा समन्याऽ. वसानो महान्कविर्निवचनानि शसन्।। आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ॥१४००

Veda : Samveda | Mantra No : 1400

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में मानव को उद्बोधन दिया गया है।

पदपाठ : भद्रा । यस्रा । समन्या । वसानः । महान् । कविः । निवचनानि । नि । वचनानि । शसन् । आ । वच्यस्व । चम्वोः । पूयमानः । विचक्षणः । वि । चक्षणः । जागृविः । देववीतौ । देव । वीतौ । ॥

पदार्थ : हे मानव ! (समन्या) सङ्ग्राम के योग्य, (भद्रा) उत्तम (वस्त्रा) वस्त्रों को (वसानः) पहनता हुआ, (महान्) महान् (कविः) विद्वान्, (निवचनानि) स्तोत्रों का (शंसन्) कीर्तन करता हुआ, (चम्वोः) आत्मा और मन में (पूयमानः) पवित्र किया जाता हुआ, (विचक्षणः) दूरद्रष्टा, (देववीतौ) परमात्मा की पूजा में (जागृविः) जागरूक तू (आवच्यस्व) चारों ओर प्रशंसा प्राप्त कर ॥२॥

भावार्थ : विघ्नों और विपदाओं से भरे होने के कारण सङ्ग्राम-तुल्य जीवन में मनुष्य हृदय में वीर-भाव रखकर, वीरोचित वेशभूषा आदि धारण कर, वीरोचित कार्यों को करता हुआ, जागरूक, पवित्र मनवाला परमेश्वर का पूजक होता हुआ यशस्वी बने ॥२॥