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Samveda/1408

अभि त्रिपृष्ठं वृषणं वयोधामाङ्गोषिणमवावशंत वाणीः। वना वसानो वरुणो न सिन्धूर्वि रत्नधा दयते वार्याणि॥१४०८

Veda : Samveda | Mantra No : 1408

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५२८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ राजा और जीवात्मा का विषय कहते हैं।

पदपाठ : अभि । त्रिपृष्ठम् । त्रि । पृष्ठम् । वृषणम् । वयोधाम् । वयः । धाम् । अङ्गोषिणम् । अवावशन्त । वाणीः । वना । वसानः । वरुणः । न । सिन्धुः । वि । रत्नधाः । रत्न । धाः । दयते । वार्याणि॥

पदार्थ : प्रथम—राजा के पक्ष में। (वाणीः) प्रजाओं की वाणियाँ (त्रिपृष्ठम्) प्रजा, सभा-समिति और सेना इन तीन पृष्ठोंवाले, (वृषभम्) बलवान् वा सुखवर्षीं, (वयोधाम्) अन्न प्रदान करनेवाले, (अङ्गोषिणम्) राज्य के सब अङ्गों में व्याप्त होनेवाले राजा को (अभि अवावशन्त) प्रशंसित करती हैं। (वना) जंगलों को (वसानः) आच्छादित करते हुए (वरुणः न) अग्नि के समान (वना) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ वह राजा (सिन्धुः) समुद्र के समान (रत्नधाः) रत्नों को धारण करनेवाला होता हुआ (वार्याणि) वरणीय रत्नों अर्थात् रमणीय ऐश्वर्यों को (वि दयते) विशेषरूप से प्रजाओं को प्रदान करता है ॥द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। (वाणीः) वेदवाणियाँ (त्रिपृष्ठम्) ज्ञान, कर्म, उपासना रूप तीन पृष्ठोंवाले, (वृषणम्) बलवान् वा बल बरसानेवाले, (वयोधाम्) आयु को धारण करनेवाले, (अङ्गोषिणम्) ईश-स्तुति करनेवाले जीवात्मा की (अभि अवावशन्त) स्तुति करती हैं अर्थात् महत्ता वर्णन करती हैं, ‘तू विद्वान् है, वर्चस्वी है, शरीर-रक्षक है। श्रेष्ठों से मिल, बराबरवालों से आगे बढ़ (अथ० २।११।४)’ । आदि मन्त्रों से आत्मा को उद्बोधन देती हैं। (वरुणः न) सूर्य के समान (वना) तेजों को (वसानः) धारण करता हुआ, (सिन्धुः) रत्नों के खजाने समुद्र के समान (रत्नधाः) रमणीय सद्गुणरूप रत्नों को धारण करनेवाला वह सोम जीवात्मा (वार्याणि) निवारण करने योग्य विघ्न आदियों को (विदयते) विशेषरूप से विनष्ट कर देता है ॥१॥यहाँ श्लेष, श्लिष्टोपमा और लुप्तोपमा अलङ्कार हैं ॥१॥

भावार्थ : जो राजा प्रजाओं का अनुरञ्जन करता है, प्रजा भी उसके गुणगान करती है। वैसे ही जो देहधारी जीवात्मा अपनी शक्ति को पहचानकर अपने तेजों से सब आन्तरिक और बाह्य विघ्नों का उन्मूलन करता है, वह सर्वत्र विजयलाभ करता है ॥१॥