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Samveda/1409

शूरग्रामः सर्ववीरः सहावान् जेता पवस्व सनिता धनानि। तिग्मायुधः क्षिप्रधन्वा समत्स्वषाढः साह्वान्पृतनासु शत्रून्॥१४०९

Veda : Samveda | Mantra No : 1409

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में राजा और जीवात्मा को उद्बोधन देते हैं।

पदपाठ : शूरग्रामः । शूर । ग्रामः । सर्ववीरः । सर्व । वीरः । सहावान् । जेता । पवस्व । सनिता । धनानि । तिग्मायुधः । तिग्म । आयुधः । क्षिप्रधन्वा । क्षिप्र । धन्वा । समत्सु । स । मत्सु । अषाढः । साह्वान् । पृतनासु । शत्रून्॥

पदार्थ : प्रथम—राजा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् वीर राजन् ! (शूरग्रामः) शूर योद्धा-गणवाले, (सर्ववीराः) सब वीर प्रजाओंवाले, (सहावान्) सहनशील, (जेता) विजयशील, (धनानि) ऐश्वर्यों के (सनिता) दाता, (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रोंवाले, (क्षिप्रधन्वा) शीघ्र धनुषवाले, (समत्सु) युद्धों में (अषाढः) परास्त न होनेवाले, (पृतनासु) शत्रु-सेनाओं में (शत्रून्) शत्रुओं को (साह्वान्) पराजित करनेवाले आप (पवस्व) पराक्रम दिखाओ ॥द्वितीय—जीवात्मा के पक्ष में। हे सोम जीवात्मन् ! (शूरग्रामः) शूर प्राण-गणवाला, (सर्ववीरः) जिसके मन, बुद्धि आदि सब वीर हैं ऐसा, (सहावान्) उत्साही, (जेता) विजयशील, (धनानि) सद्गुणरूप ऐश्वर्यों को (सनिता) प्राप्त करनेवाला, (तिग्मायुधः) तीक्ष्ण शत्रुदाहक तेजोंवाला, (क्षिप्रधन्वा) वेग से चलनेवाले प्रणव-जपरूप धनुषवाला, (समत्सु) आन्तरिक देवासुर संग्रामों में (अषाढः) पराजित न होनेवाला, (पृतनासु) काम, क्रोध आदि की सेनाओं में (शत्रून्) शत्रुओं को (साह्वान्) पराजित करनेवाला तू (पवस्व) क्रियाशील हो अथवा स्वयं को पवित्र रख ॥२॥यहाँ श्लेषालङ्कार है। विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर अलङ्कार भी है। ऐसे विलक्षण गुणों से सुशोभित भी तू यदि विक्रम नहीं दिखाता, क्रियाशील नहीं होता अथवा पवित्र आचरण नहीं रखता, तो ये गुण भारस्वरूप ही होंगे, यह आशय है ॥२॥

भावार्थ : देह में मनुष्य का आत्मा और राष्ट्र में राजा यदि शत्रुओं को पराजित करके योगक्षेम करते हैं, तो देह और राष्ट्र का स्वराज्य अक्षुण्ण रहता है ॥२॥