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Samveda/1411

त्वमिन्द्र यशा अस्यृजीषी शवसस्पतिः। त्वं वृत्राणि ह स्यप्रतीन्येक इत्पुर्वनुत्तश्चर्षणीधृतिः॥१४११

Veda : Samveda | Mantra No : 1411

In Hindi:

ऋषि : नृमेध पुरुमेधावाङ्गिरसौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में २४८ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में की गयी थी। यहाँ एक-साथ परमात्मा, राजा और आचार्य का विषय वर्णित करते हैं।

पदपाठ : त्वम् । इन्द्र । यशाः । असि । ऋजीषी । शवसः । पतिः । त्वम् । वृत्राणि । हसि । अप्रतीनी । अ । प्रतीनी । एकः । इत् । पुरु । अनुत्तः । अ । नुत्तः । चर्षणिधृतिः । चर्षणि । धृतिः॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) परमात्मन्, राजन् व आचार्य ! (त्वम्) आप (यशाः) यशस्वी, (ऋजीषी) सरल नीतिवाले और (शवसः पतिः) आत्मबल, देहबल वा विद्याबल के स्वामी (असि) हो। (एकः इत्) अद्वितीय ही (त्वम्) आप (पुरु) बहुत से (अप्रतीनि) अप्रतिद्वन्द्वी अज्ञान, पाप, दुःख, दुर्व्यसन आदि को (हंसि) विनष्ट करते हो। हे परमात्मन्, राजन् वा आचार्य ! आप (अनुत्तः) किसी से प्रेरित किये बिना, स्वतः ही (चर्षणीधृतिः) मनुष्यों को धारण करनेवाले होते हो ॥१॥

भावार्थ : जैसे परमेश्वर संसार का उपकार करनेवाले अपने कार्यों से यशस्वी होता हुआ सरल नीति से सब दोष, दुःख,  दुर्व्यसन आदि को नष्ट करता है, वैसे ही राजा और गुरु को करना चाहिए ॥१॥