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Samveda/1410

उरुगव्यूतिरभयानि कृण्वन्त्समीचीने आ पवस्वा पुरन्धी। अपः सिषासन्नुषसः स्वऽर्गाः सं चिक्रदो महो अस्मभ्यं वाजान् ()।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१४१०

Veda : Samveda | Mantra No : 1410

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : उरूगव्यूतिः । उरु । गव्यूतिः । अभयानि । अ । भयानि । कृण्वम् । समीचीने । सम् । ईचीनेइति । आ । पवस्व । पुरन्धी । पुरम् । धीइति । अपः । सिषासन् । उषसः । स्वः । गाः । सम् । चिक्रदः । महः । अस्मभ्यम् । वाजान्॥

पदार्थ : प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् सर्वान्तर्यामी परमात्मन् ! (उरुगव्यूतिः) विस्तीर्ण मार्ग या कार्यक्षेत्रवाले, सबको (अभयानि) निर्भय (कृण्वन्) करनेवाले आप (समीचीने) आपस में सङ्गति रखनेवाले (पुरन्धी) द्युलोक तथा भूलोक को और देहपुरी के धारणकर्ता प्राण-अपान को (आ पवस्व) पवित्र करो। (अपः) जलों को, (उषसः) उषाओं को (स्वः) सूर्य को और (गाः) भूमियों को (सिषासन्) देनेवाले आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिए (महः वाजान्) महान् अन्न, धन, बल आदि को (सं चिक्रदः) बुलाते हो, प्रदान करते हो ॥द्वितीय—राजा के पक्ष में। हे सोम अर्थात् प्रजापालक राजन् ! (उरुगव्यूतिः) राष्ट्र में यातायात के लिए चौड़े मार्ग बनवानेवाले और उन मार्गों पर (अभयानि) निर्भयता (कृण्वन्) करनेवाले आप (समीचीने) भली-भाँति कार्य में तत्पर (पुरन्धी) स्त्री-पुरुषों को (आ पवस्व) सहायता के लिए प्राप्त होओ। आप (अपः) नदी, प्रपात आदि के जलों को, (उषसः) बिजलियों को, (स्वः) सूर्य, को और (गाः) भूमियों को (सिषासन्) उपयोग में लाने की योजनाएँ बनाते हुए (अस्मभ्यम्) हम प्रजाओं के लिए (महः वाजान्) महान्, अन्न, धन आदि (संचिक्रदः) बुलाओ, प्राप्त कराओ ॥३॥यहाँ श्लेषालङ्कार है ॥३॥

भावार्थ : परमेश्वर ने हमारे लिए भूमि, जल, वायु बिजली, सूर्य-किरणें आदि पदार्थ बिना मूल्य के दिये हुए हैं। राजा का कर्तव्य है कि उनका शिल्पकार्यों में उपयोग करके राष्ट्रवासियों को सुखी करे ॥३॥