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Samveda/1418

साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः। हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी॥१४१८

Veda : Samveda | Mantra No : 1418

In Hindi:

ऋषि : नोधा गौतमः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५३८ क्रमाङ्क पर सोम ओषधि और परमात्मा की प्राप्ति के विषय में की जा चुकी है। यहाँ परमात्मा की ही प्राप्ति का विषय भिन्न प्रकार से वर्णित है।

पदपाठ : साकमुक्षः । साकम् । उक्षः । मर्जयन्तः । स्वसारः । दश । धीरस्य । धीतयः । धनुत्री । हरिः । परि । अद्रवत् । जाः । सूर्यस्य । सु । ऊर्यस्य । द्रोणम् । ननक्षे । अत्यः । न । वाजी॥

पदार्थ : (धीरस्य) ध्यान में संलग्न जीवात्मा को (साकमुक्षः) एक साथ ज्ञान से सींचनेवाली, (स्वसारः) बहिनों के समान प्रिय, (धनुत्र्यः) तृप्ति प्रदान करनेवाली (दश) दस (धीतयः) चार वेद और छह वेदाङ्गरूप प्रज्ञाएँ (मर्जयन्त) शुद्ध करती हैं। तब (सूर्यस्य) सूर्य के समान प्रकाशमान और प्रकाशक परमात्मा का (जाः) पुत्र (हरिः) जीवात्मा (पर्यद्रवत्) परमात्मा को पाने के लिए सक्रिय हो जाता है और (अत्यः न) घोड़े के समान (वाजी) वेगवान् वह (द्रोणम्) प्राप्तव्य उस अपने पिता परमात्मा को (ननक्षे) पा लेता है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है। द्वितीय चरण में धकार का और चतुर्थ में नकार का अनुप्रास है ॥१॥

भावार्थ : वेद-वेदाङ्गों को आचार्य से भलीभाँति पढ़कर ज्ञानी और अत्यन्त निर्मल अन्तःकरणवाला जीव अभ्युदय और निःश्रेयस प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है ॥१॥