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Samveda/1417

स वाजं विश्वचर्षणिरर्वद्भिरस्तु तरुता। विप्रेभिरस्तु सनिता (ठा)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१४१७

Veda : Samveda | Mantra No : 1417

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेप आजीगर्तिः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : सः । वाजम् । विश्वचर्षणिः । विश्व । चर्षणिः । अर्वद्भिः । अस्तु । तरुता । विप्रेभिः । वि । प्रेभिः । अस्तु । सनिता॥

पदार्थ : (विश्वचर्षणिः) सब मनुष्यों पर अनुग्रह करनेवाला (सः) वह अग्रणी जगदीश्वर (अर्वद्भिः) आक्रमणकारी क्षत्रिय योद्धाओं द्वारा (वाजम्) संग्राम को (तरुता) पार करानेवाला (अस्तु) होवे और (विप्रेभिः) मेधावी ब्राह्मणों द्वारा (सनिता) ज्ञान आदि को देनेवाला (अस्तु) होवे ॥३॥

भावार्थ : निराकार परमेश्वर ब्राह्मणों के माध्यम से ज्ञान का दान, क्षत्रियों के माध्यम से रक्षा, वैश्यों के माध्यम से पोषक पदार्थों का दान करता हुआ मनुष्यों का उपकार करता है ॥३॥