Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1424

स भक्षमाणो अमृतस्य चारुण उभे द्यावा काव्येना वि शश्रथे। तेजिष्ठा अपो महना परि व्यत यदी देवस्य श्रवसा सदो विदुः॥१४२४

Veda : Samveda | Mantra No : 1424

In Hindi:

ऋषि : रेणुर्वैश्वामित्रः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : आगे परमात्मा के उपासक का विषय है।

पदपाठ : सः । भक्षमाणः । अमृतस्य । अ । मृतस्य । चारुणः । उभेइति । द्यावा । काव्येन । वि । शञ्चये । तेजिष्ठा । अपः । महना । परि । व्यत् । यदि । दवस्य । श्रवसा । सदः । विदुः॥ ।

पदार्थ : (सः) वह परमेश्वर का उपासक (चारुणः) सुन्दर (अमृतस्य)उपासनाजन्य दिव्य आनन्द का (भक्षमाणः) सेवन करता हुआ (काव्येन) वेदकाव्य द्वारा (उभे द्यावा) दीप्यमान दोनों अभ्युदय और निःश्रेयस वा ज्ञान और कर्म को (विशश्रथे) विश्लेषणपूर्वक जान लेता है। साथ ही (मंहना) अपने महत्त्व से (तेजिष्ठाः अपः) अतिशय तेजस्वी कर्मों को (परि व्यत) धारण कर लेता है अर्थात् जीवन का अङ्ग बना लेता है (यदि) जिन्हें (सदः) शिष्यभाव से आचार्य के समीप पहुँचनेवाले विद्यार्थी (देवस्य) ज्ञान के प्रकाशक आचार्य के (श्रवसा) उपदेश-श्रवण से (विदुः) जाना करते हैं ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना का यह फल होता है कि उपासक कर्तव्य-अकर्तव्य का विवेचन करके प्रशस्त कर्मों का ही आचरण करता है, निन्दित का नहीं ॥२॥