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Samveda/1429

यज्जायथा अपूर्व्य मघवन्वृत्रहत्याय। तत्पृथिवीमप्रथयस्तदस्तभ्ना उतो दिवम्॥१४२९

Veda : Samveda | Mantra No : 1429

In Hindi:

ऋषि : नृमेध पुरुमेधावाङ्गिरसौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ६०१ क्रमाङ्क पर परमेश्वर के विषय में व्याख्यात की गयी थी। यहाँ भी वही विषय प्रकारान्तर से दर्शाया जा रहा है।

पदपाठ : यत् । जायथाः । अपूर्व्य । अ । पूर्व्य । मघवन् । वृत्रहत्याय । वृत्र । हत्याय । तत् । पृथिवीम् । अप्रथयः । तत् । अस्तम्नाः । उत । उ । दिवम्॥

पदार्थ : हे (अपूर्व्य) स्वयम्भू, (मघवन्) ऐश्वर्यशाली इन्द्र जगदीश्वर ! (यत्) क्योंकि, आप (वृत्रहत्याय) विघ्नों के विनाश के लिए (जायथाः) समर्थ हो, (तत्) इसी कारण, आप (पृथिवीम्)भूमण्डल को (अप्रथयः) फैला सके हो, (उत उ) और (तत्) इसी कारण (दिवम्) सूर्य को (अस्तभ्नाः) स्थिर कर सके हो ॥१॥

भावार्थ : जो विघ्नों को विनष्ट करने में समर्थ होता है, वही हाथ में लिये कार्यों में सफल होता है ॥१॥