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Samveda/1430

तत्ते यज्ञो अजायत तदर्क उत हस्कृतिः । तद्विश्वमभिभूरसि यज्जातं यच्च जन्त्वम्॥१४३०

Veda : Samveda | Mantra No : 1430

In Hindi:

ऋषि : नृमेध पुरुमेधावाङ्गिरसौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में जगदीश्वर की महिमा का वर्णन है।

पदपाठ : तत् । ते । यज्ञः । अजायत । तत् । अर्कः । उत । हस्कृतिः । तत् । विश्वम् । अभिभूः । अभि । भूः । असि । यत् । जातम् । यत् । च । जन्त्वम्॥

पदार्थ : हे इन्द्र जगदीश्वर ! क्योंकि आप विघ्नों के विनाश में समर्थ हो (तत्) इसी कारण (ते) आपका (यज्ञः) सृष्टिरूप यज्ञ (अजायत) उत्पन्न हो सका है। (तत्) इसी कारण (अर्कः) सूर्य (उत) और (हस्कृतिः) बिजली का अट्टहास उत्पन्न हो सका है। (तत्) इसी कारण (विश्वम्) सब कुछ (यत् जातम्) जो पैदा हो चुका है। (यत् च जन्त्वम्) और जो भविष्य में पैदा होना है, उसे आप (अभिभूः असि) अपनी महिमा से तिरस्कृत किये हुए हो ॥२॥

भावार्थ : विघ्नों के विनाश में समर्थ होने से ही परमेश्वर सूर्य, चन्द्र, बिजली, नक्षत्र आदि से युक्त इस सब जगत् को बनाने और धारण करने में सफल होता है ॥२॥