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Samveda/1443

अस्माअस्मा इदन्धसोऽध्वर्यो प्र भरा सुतम्। कुवित्समस्य जेन्यस्य शर्धतोऽभिशस्तेरवस्वरत् (ठ)।।॥१४४३

Veda : Samveda | Mantra No : 1443

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमात्मोपासना का विषय है।

पदपाठ : अस्मै । अस्मै । इत् । अन्धसः । अध्यर्यो । प्र । भर । सुतम् । कुवित् । समस्य । जेन्यस्य । शर्धतः । अभिशस्तेः । अभि । शस्ते । अवस्वरत् । अव । स्वरत्॥

पदार्थ : हे (अध्वर्यो) उपासना-यज्ञ के इच्छुक ! (अस्मै अस्मै इत्) इसी इन्द्र जगदीश्वर के लिए (अन्धसः) श्रद्धारूप सोम के (सुतम्) रस को (प्र भर) लाओ। वह इन्द्र जगदीश्वर (कुवित्) बहुत अधिक (समस्य) सब (जेन्यस्य) जीते जाने योग्य (शर्धतः) हिंसक शत्रुओं से की जानेवाली (अभिशस्तेः) हिंसा वा निन्दा से (अवस्वरत्) उद्धार कर देवे ॥४॥

भावार्थ : परमेश्वर में श्रद्धा रखनेवाले मनुष्य की कोई भी हिंसा नहीं कर सकता, न ही उसे अपयश का पात्र बना सकता है ॥४॥इस खण्ड में परमात्मा की उपासना का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥तेरहवें अध्याय में प्रथम खण्ड समाप्त ॥