Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1453

विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम्। वातजूतो यो अभिरक्षति त्मना प्रजाः पिपर्ति बहुधा वि राजति॥१४५३

Veda : Samveda | Mantra No : 1453

In Hindi:

ऋषि : विभ्राट सौर्यः | देवता : सूर्यः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ६२८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ सूर्य के वर्णन द्वारा परमात्मा की महिमा का प्रकाशन है।

पदपाठ : विभ्राट । वि । भ्राट । बृहत् । पिबतु । सोम्यम् । मधु । आयुः । दधत् । यज्ञपतौ । यज्ञ । पतौ । अविह्रुतम् । अवि । हुतम् । वातजूतः । वात । जूतः । यः । अभिरक्षति । अभि । रक्षति । त्मना । प्रजाः । प्र । जाः । पिपर्ति । बहुधा । वि । राजति॥

पदार्थ : (विभ्राट्) विशेषरूप से भ्राजमान सूर्य (यज्ञपतौ) यजमान को (अविह्रुतम्) अकुटिल (आयुः) आयु (दधत्) प्रदान करता हुआ (बृहत्) विशाल (सोम्यम्) सोम आदि ओषधियों के रस से युक्त (मधु) जल को (पिबतु) पिये, (वातजूतः) सूत्रात्मक प्राण के द्वारा प्रेरित (यः) जो सूर्य (त्मना) अपने-आप (अभि रक्षति) सम्पूर्ण सौरमण्डल की रक्षा करता है, (प्रजाः) जड़-चेतन-रूप प्रजाओं को (पिपर्ति) पालित-पूरित करता है और (बहुधा) अनेक रूपों में (वि राजति) विराजमान होता है, क्योंकि प्रत्येक मास में नवीन-नवीन रूप धारण करता है ॥१॥

भावार्थ : यह जगदीश्वर की ही महिमा है कि उसने वर्षा करनेवाला, बहुत उपकार करनेवाला तेज का गोला सूर्यलोक रचा है ॥१॥