Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1454

विभ्राड् बृहत्सुभृतं वाजसातमं धर्मं दिवो धरुणे सत्यमर्पितम्। अमित्रहा वृत्रहा दस्युहन्तमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा॥१४५४

Veda : Samveda | Mantra No : 1454

In Hindi:

ऋषि : विभ्राट सौर्यः | देवता : सूर्यः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में सूर्य की ज्योति का वर्णन करके परमात्मा की महिमा प्रकाशित की गयी है।

पदपाठ : विभ्राट । वि । भ्राट । बृहत् । सुभृतम् । सु । भृतम् । वाजसातमम् । वाज । सातमम् । धर्मन । दिवः । धरुणे । सत्यम् । अर्पितम् । अमित्रहा । अमित्र । हा । वृत्रहा । वृत्र । हा । दस्युहन्तमम् । दस्यु । हन्तमम् । ज्योतिः । जज्ञे । असुरहा । असुर । हा । सपत्नहा । सपत्न । हा॥

पदार्थ : देखो, (विभ्राट्) देदीप्यमान, (बृहत्) विशाल, (सुभृतम्) अत्यन्त पुष्ट, (वाजसातमम्) अन्न और बल की अतिशय देनेवाली, (सत्यम्) सत्य नियमोंवाली, (धर्मन्) ग्रहोपग्रहों के धारणकर्ता (दिवः धरुणे) द्युलोक के स्तम्भरूप सूर्य में (अर्पितम्) अर्पित, (अमित्रहा) रोग आदि शत्रुओं को नष्ट करनेवाली, (वृत्रहा) अन्धकार की विनाशक, (दस्युहन्तमम्) चोर आदि दस्युओं को दूर करनेवाली, (असुरहा) अप्रशस्त दुर्भिक्ष आदि को विनष्ट करनेवाली, (सपत्नहा) एक साथ आक्रमण करनेवाले रोग-कृमियों की विनाशक (ज्योतिः) सूर्य की ज्योति (जज्ञे) प्रादुर्भूत हुई है ॥२॥यहाँ स्वभावोक्ति अलङ्कार है। ‘हा’ का चार बार प्रयोग होने के कारण वृत्त्यनुप्रास है। ‘तमं’ और ‘त्रहा’ के दो-दो बार प्रयोग में छेकानुप्रास है ॥२॥

भावार्थ : रात्रि के घोर अन्धकार को विध्वस्त करती हुई सूर्य की ज्योति परमात्मा की आभा की ओर संकेत करती है ॥२॥