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Samveda/1456

इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा। शिक्षा णो अस्मिन्पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि॥१४५६

Veda : Samveda | Mantra No : 1456

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २५९ क्रमाङ्क पर परमात्मा और आचार्य को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमात्मा से प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : इन्द्र । क्रतुम । नः । आ । भर । पिता । पुत्रेभ्यः । पुत् । त्रेभ्यः । यथा । शिक्ष । नः । अस्मिन् । पुरुहुत । पुरु । हूत । यामनि । जीवाः । ज्योतिः । अशीमहि॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विघ्नविनाशक, विश्ववेत्ता, सर्वकारी, सर्वशक्तिमन् परमात्मन् ! आप (नः) हमें (क्रतुम्) प्रज्ञा और कर्म को (आ भर) प्रदान करो, (यथा) जिस प्रकार (पिता) पिता (पुत्रेभ्यः) सन्तानों को प्रदान करता है। हे (पुरुहूत) बहुतों से पुकारे जानेवाले जगदीश्वर ! आप (अस्मिन् यामनि) इस संसार-मार्ग में (नः) हमें (शिक्ष) कर्तव्य-अकर्तव्य की शिक्षा दो। (जीवाः) जीवन से अनुप्राणित हम, आपके पास से (ज्योतिः) दिव्य ज्योति को (अशीमहि) प्राप्त करें ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जैसे माता, पिता और आचार्य मनुष्य के शिक्षक हैं, वैसे ही परमेश्वर भी है। वह अन्तरात्मा में प्रविष्ट हुआ सदा ही सत्य-असत्य का उपदेश करता रहता है ॥१॥