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Samveda/1457

मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्योऽमाशिवासोऽव क्रमुः। त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपोऽति शूर तरामसि (ल)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१४५७

Veda : Samveda | Mantra No : 1457

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में फिर परमात्मा से प्रार्थना है।

पदपाठ : मा । नः । अज्ञाताः । अ । ज्ञाताः । वृजनाः । दुराध्यः । दुः । आध्यः । मा । अशिवासः । अ । शिवासः । अव । क्रमुः । त्वया । वयम् । प्रवतः । शश्वती । अपः । अति । शूर । तरामसि॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जगदीश ! (मा) न तो (अज्ञाताः) अज्ञात (वृजनाः) बलवान् वा युद्ध करनेवाले (दुराध्यः) बुरे मनसूबे बाँधनेवाले शत्रु और (मा) न ही (अशिवासः) अभ्रद परिचित लोग (नः) हमें (अवक्रमुः) पददलित कर सकें। हे (शूर) वीर जगदीश्वर ! (त्वया) आपकी सहायता से (प्रवतः) उत्कृष्ट आचरणवाले (वयम्) हम आपके उपासक (शश्वतीः) बहुत सी (अपः) नदियों को अर्थात् नदियों के समान उमड़नेवाली बाधाओं को (अति तरामसि) पार कर लेवें ॥२॥

भावार्थ : जैसे शत्रु लोग, वैसे ही सम्बन्धी जन भी कभी-कभी पाप आदि कर्मों में लिप्त करते हैं और विघ्न भी धर्ममार्ग में बाधक होते हैं। परमेश्वर से बल पाकर उन सबको हम लाँघ जाएँ ॥२॥