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Samveda/1463

सोमानां स्वरणं (कृणुहि ब्रह्मणस्पते। कक्षीवन्तँ य औशिजः)*॥१४६३

Veda : Samveda | Mantra No : 1463

In Hindi:

ऋषि : मेधातिथिः काण्वः | देवता : ब्रह्मणस्पतिः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : द्वितीय ऋचा पूर्वार्चिक में १३९ क्रमाङ्क पर जगदीश्वर को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ आचार्य को कहते हैं।

पदपाठ : सोमानाम । स्वरणम् । कृणुहि । ब्रह्मणः । पते । कक्षीवन्तम् । यः । औशिजः॥

पदार्थ : हे (ब्रह्मणः पते) वेदों के प्रकाण्ड पण्डित आचार्य ! (यः) जो मैं (औशिजः) बहुत अधिक वेदाध्ययन का इच्छुक हूँ, उस मुझको, आप (सोमानाम्) ज्ञानों का (स्वरणम्) प्राप्तकर्ता और (कक्षीवन्तम्) कटिबद्ध (कृणुहि) कर दो ॥२॥

भावार्थ : गुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे शिष्यों को विद्वान् और कर्मयोगी बनायें। पुरुषार्थहीन विद्वत्ता कुछ काम नहीं आती है ॥२॥