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Samveda/1464

अग्न आयूषि पवसे (आ सुवोर्जं इषं च नः। आरे बाधस्व दुच्छुनाम्)* (य)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१४६४

Veda : Samveda | Mantra No : 1464

In Hindi:

ऋषि : शतं वैखानसः | देवता : अग्निः पवमानः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में ६२७ क्रमाङ्क पर परमात्मा और विद्वान् राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ आचार्य को कहते हैं।

पदपाठ : अग्ने । आयूषि । पवसे । आ । सुव । ऊर्जम् । ईषम् । च । ना । आरे । बाधस्व । दुच्छुनाम्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) चरित्र को ऊँचा उठानेवाले आचार्यवर ! आप शिष्यों के (आयूंषि) जीवनों को (पवसे) पवित्र करते हो। (नः) हम शिष्यों के लिए (ऊर्जम्) आत्मबल वा चरित्र-बल, (इषं च) और अभीष्ट विद्या (आसुव) प्रदान करो। (दुच्छुनाम्) दुर्गति करनेवाली अविद्या को (आरे) दूर (बाधस्व) बाधित कर दो ॥३॥

भावार्थ : श्रेष्ठ आचार्य को प्राप्त कर विद्यार्थी पवित्रात्मा और विद्वान् होकर समावर्तन के अनन्तर घर आकर राष्ट्र को उन्नत करें ॥३॥